Sunderkand ( सुन्दरकाण्ड ) Hindi PDF – Goswami Tulsidas

Sunderkand mulatah valmiki krit Ramayan ka ek mahatvpurn bhag (Kand ya Sopan) hai. Goswami Tulasi Das krit Shree Ramcharit manas tatha any bhashao ke Ramayan me bhi Sundarkand upasthit hai. Sundarkand me Hanuman ji dvara kiye gye mahan karyo ka varnan hai. Ramayan path me sundarkand ke path ka vishesh mahatv mana jata hai. Sundarkand me hanuman ka lanka prasthan, lanka dahan se lanka se vapsi tk ke ghatanakram aate hai. Is sopan ke mukhy ghatnakram hai – hanuman ji ka lanka ki or prasthan, vibheeshan se bhent, seeta se bhent krke unhe Shree Ram ki mudrika dena, Akshay kumar ka vadh, lanka dahan aur lanka se vapsi. 

सुन्दरकाण्ड हिंदी में 

श्लोक

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्।।1।।

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च।।2।।

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।3।।

चौपाई

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।1।।

जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।2।।

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।3।।

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।4।।

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।5।।

दोहा :

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।

चौपाई

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।6।।

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।7।।

तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।8।।

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।9।।

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।10।।

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।11।।

दोहा :

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।

चौपाई

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।12।।

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।13।।

ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।14।।

नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।15।।

उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।16।।

अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।17।।

छंद

कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।1।।

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।2।।

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।3।।

दोहा :

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।

चौपाई

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।18।।

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।19।।

पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।20।।

बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।21।।

दोहा :

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।

चौपाई

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।22।।

गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।23।।

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।24।।

सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।25।।

दोहा :

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।

चौपाई

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।26।।

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।27।।

बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।28।।

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।29।।

दोहा :

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।

चौपाई

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।30।।

तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।31।।

जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।32।।

कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।33।।

दोहा :

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।

चौपाई

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।34।।

पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।35।।

जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।36।।

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।37।।

दोहा :

निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।

चौपाई

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।38।।

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।39।।

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।40।।

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।41।।

सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।42।।

दोहा :

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।

चौपाई

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।43।।

स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।44।।

चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।45।।

सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।46।।

मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।47।।

दोहा :

भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।

Aur adhik pdhne ke liye niche diye hue download link pr click kre..

Is pustak ka kul size 284 KB hai aur kul pristho ki sankhya 66 hai. Niche diye hue link se is pustak ko aasani se download kr skte hai aur muft me pdh skte hai. Agr aap is pustak ki hard copy lena chahte hai to niche hm Amazon ka link bhi provide kr rhe hai aap vha se esaily is pustak ko khrid skte hai. Pustke hmari sachchi mitr hoti hai aur Freehindibook.com pr aapko hjaro pustke muft me pdhne ko mil jayengi.

Book WriterValmiki
Book LanguageHindi
Book Size284 KB
Total Pages66
CategoryReligious - Hindusim

Download Free Hard Copy  
Donate us for maintenance
Buy this book from Amazon 
Listen this book on Audible 

If you’re loving our work Don’t Forget to Donate Us.

Ramcharitmanas ke shes bhag :

Leave a Comment